॥ अथ श्री काली चालीसा ॥
॥ दोहा ॥
मात कालिका के चरन,
सुमिर शीश नवाय।
कहत सुन्दरा दास जो,
उर आनंद समाय॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय काली कंकाली।
जय जय जय खप्पर वाली॥
जय जय जय खप्पर वाली॥
जय जय जय जय कंठ कराली।
जय जय जय अष्टभुजी वाली॥
जय जय जय अष्टभुजी वाली॥
अरुन वसन तन पै विराजे।
हाथ खड्ग और खप्पर साजे॥
हाथ खड्ग और खप्पर साजे॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीको।
टीका लाल भाल पर नीको॥
टीका लाल भाल पर नीको॥
गल में मुण्डन की है माला।
रक्तन से भरि दीन्हो प्याला॥
रक्तन से भरि दीन्हो प्याला॥
छवि लखि सुर नर मुनि जन मोहे।
भय मानत जो तुम्हरे को है॥
भय मानत जो तुम्हरे को है॥
सवा लाख की सेना मारी।
चण्ड मुण्ड असुरन संहारी॥
चण्ड मुण्ड असुरन संहारी॥
रक्तबीज को कीन्हा नाशा।
जब सुर नर मुनि कीन्हा आशा॥
जब सुर नर मुनि कीन्हा आशा॥
शुम्भ निशुम्भ असुर संहारे।
पड़े भूमि पर इव मतवारे॥
पड़े भूमि पर इव मतवारे॥
जब जब भार परत पृथ्वी पर।
ले अवतार तारती भू पर॥
ले अवतार तारती भू पर॥
महाकाल की तुम हो प्यारी।
आदि शक्ति हो सब पर भारी॥
आदि शक्ति हो सब पर भारी॥
तुम्हरी महिमा अपरम्पारा।
पावत शेष न जाको पारा॥
पावत शेष न जाको पारा॥
तुम सब जीवन की प्रतिपाला।
जपत रहत नित दीन दयाला॥
जपत रहत नित दीन दयाला॥
तुम ही लक्ष्मी तुम ही दुर्गा।
तुम ही जानकी तुम ही सीता॥
तुम ही जानकी तुम ही सीता॥
तुम ही राधा तुम ही सावित्री।
तुम्हीं सरस्वती तुम्हीं गायत्री॥
तुम्हीं सरस्वती तुम्हीं गायत्री॥
अनेकानेक रूप तुम धारे।
विधि नहिं पावत पार तुम्हारे॥
विधि नहिं पावत पार तुम्हारे॥
जो नर ध्यान धरत हैं तेरा।
ताको होवत काज घनेरा॥
ताको होवत काज घनेरा॥
जो कोई यह चालीसा गावे।
सब सुख पावत कष्ट नसावे॥
सब सुख पावत कष्ट नसावे॥
रोज नहाइ जो ध्यान लगावे।
ध्यान लगाइ जो पाठ सुनावे॥
ध्यान लगाइ जो पाठ सुनावे॥
ताके गृह बसहिं तु भवानी।
जाने यह सब जगत बखानी॥
जाने यह सब जगत बखानी॥
बन्ध्या होय जो सुत नहिं पावे।
निशि दिन तोहि मनावे गावे॥
निशि दिन तोहि मनावे गावे॥
निश्चय ही सो सुत फल पावे।
सत्य वचन यह झूठ न जावे॥
सत्य वचन यह झूठ न जावे॥
कहत सुन्दरा दास बिचारी।
निशि दिन सुमिरौं चरण तुम्हारी॥
निशि दिन सुमिरौं चरण तुम्हारी॥
दास जान निज दया दिखावो।
दुख दारिद्र सब नाश करावो॥
दुख दारिद्र सब नाश करावो॥
॥ दोहा ॥
प्रेम सहित जो करे,
काली चालीसा पाठ।
तिनकी पूरण कामना,
होय सकल जग ठाठ॥
॥ जय माँ काली ॥