॥ अथ श्री राधा चालीसा ॥
॥ दोहा ॥
श्री राधे वुषभानुजा,
भक्तन की प्राण आधार।
वृन्दाविपिन विहारिणी,
प्रणवौं बारम्बार॥
मैं अति दीन दुखी आधम,
विनवौं बारम्बार।
करहु कृपा वृषभानुजा,
करहु वेगि निस्तार॥
॥ चौपाई ॥
जय जय वृषभानु दुलारी।
किशोरी जयति जयति भयहारी॥
किशोरी जयति जयति भयहारी॥
जयति जगत पावन छवि आली।
जयति सुखद सब विधि बलशाली॥
जयति सुखद सब विधि बलशाली॥
सेवक सुखद सदा शुभकारिणी।
करुणा सागर भव भय हारिणी॥
करुणा सागर भव भय हारिणी॥
जो जन तुमहिं सदा ध्यावैं।
ते नहिं भव बन्धन फिर आवैं॥
ते नहिं भव बन्धन फिर आवैं॥
नेति नेति कहि वेद बखानैं।
जानि न पावैं मुनि ज्ञानी॥
जानि न पावैं मुनि ज्ञानी॥
सिद्ध ईश अरु सुर मुनि देवा।
करत सदा पद पंकज सेवा॥
करत सदा पद पंकज सेवा॥
इन्द्रादिक जो सुरगण सारे।
तुम्हरो यश गावत श्रुति प्यारे॥
तुम्हरो यश गावत श्रुति प्यारे॥
जय वृषभानु सुता सुख राशी।
सकल लोक के तुम ही वासी॥
सकल लोक के तुम ही वासी॥
योगिन हृदय रास विलासिनि।
जन मन मोदक ज्ञान प्रकाशिनि॥
जन मन मोदक ज्ञान प्रकाशिनि॥
अतुलित रूप अनूप विराजै।
देखि कोटि रति लज्जित साजै॥
देखि कोटि रति लज्जित साजै॥
नित्य विहारिनि तुम ही राधा।
हरहु सकल जन की भव बाधा॥
हरहु सकल जन की भव बाधा॥
मृदु बानी अति सहज सुहावे।
सुनत श्रवण मुनि मन हर्षावे॥
सुनत श्रवण मुनि मन हर्षावे॥
कनक बरण छवि नित्य निहारूँ।
जीवन अपना तुम पर वारूँ॥
जीवन अपना तुम पर वारूँ॥
गल मोतियन की माला सोहे।
मोहित मदन मोहन मन मोहे॥
मोहित मदन मोहन मन मोहे॥
सुन्दर वदन कमल सम कोमल।
नयन विशाल सुशोभित चंचल॥
नयन विशाल सुशोभित चंचल॥
कुण्डल श्रवण देत छबि न्यारी।
नीलाम्बर सोहत तन सारी॥
नीलाम्बर सोहत तन सारी॥
कंचन कम्बु कण्ठ छवि भारी।
सुर नर मुनि जन जाहिं बलिहारी॥
सुर नर मुनि जन जाहिं बलिहारी॥
क्षुद्र घण्टिका कटि तट बाजै।
नूपुर शब्द रसाल विराजै॥
नूपुर शब्द रसाल विराजै॥
कर नवनीत लिए अति सुन्दर।
हृदय बसहु वृषभानु दुलारी॥
हृदय बसहु वृषभानु दुलारी॥
जो जन यह चालीसा गावै।
सब सुख भोग परम पद पावै॥
सब सुख भोग परम पद पावै॥
राधा नाम लेत जो कोई।
ताके सकल काज शुभ होई॥
ताके सकल काज शुभ होई॥
राधा नाम परम सुखदाई।
भजतहिं मिटै सकल कठिनाई॥
भजतहिं मिटै सकल कठिनाई॥
सुमिरन करहुँ राधा राधा।
कटि जाहिं सब भव की बाधा॥
कटि जाहिं सब भव की बाधा॥
वृन्दावन के वृक्षन की छाया।
राधा नाम जपहुँ मन लाया॥
राधा नाम जपहुँ मन लाया॥
प्रेम भक्ति मोहि दीजै माता।
कृपा दृष्टि कीजै सुखदाता॥
कृपा दृष्टि कीजै सुखदाता॥
यह चालीसा प्रेम से, पढ़हिं जो नर नारि।
तिनके ऊपर बसत हैं, राधा मोहन प्यारे॥
तिनके ऊपर बसत हैं, राधा मोहन प्यारे॥
जय जय श्री राधा जय जय श्याम।
जय जय श्री वृन्दावन धाम॥
जय जय श्री वृन्दावन धाम॥
जो यह पाठ करै चित लाई।
राधा कृष्ण मिलें सुखदाई॥
राधा कृष्ण मिलें सुखदाई॥
सहस्र बार जो पाठ करै।
राधा रानी अनुग्रह करै॥
राधा रानी अनुग्रह करै॥
कृपा दृष्टि अब हम पर कीजै।
राधा रानी दर्शन दीजै॥
राधा रानी दर्शन दीजै॥
॥ दोहा ॥
राधा रानी दया कर,
हरहु सकल अज्ञान।
मोहि अपना जान के,
दीजै पद निर्वाण॥
॥ राधे राधे ॥