मुझको कीर्ति ना वैभव ना यश चाहिए,
राम के नाम का मुझको रस चाहिए।
सुख मिले ऐसे अमृत को पीने में,
श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में॥
राम रसिया हूँ मैं, राम सुमिरन करूँ,
सिया राम का सदा ही मैं चिंतन करूँ।
देख लो चीर के मेरे सीने में,
श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में॥
जिस दिन से राम मेरे दिल में बसे,
मैंने दुनिया में हर एक को हंसे।
अब तो हर स्वास राम रंग में रंगी,
जीवन की नैया राम नाम के संगी॥
अयोध्या के वासी, रघुकुल के राजा,
मेरे जीवन की तू ही है पूजा।
मेरे रोम रोम में राम, मेरे मन में राम,
सुख-दुःख में हर क्षण, मेरे तन-मन में राम॥
श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में॥