✨ जय श्री राम | ॐ सिया रामाय नमः | जय हनुमान ✨
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Shri Ram Ji
जय श्री राम

श्री राम स्तुति

॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन ॥

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श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन, हरण भवभय दारुणम्।
नवकंज लोचन, कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणम्॥

शब्दार्थ:

  • श्री रामचन्द्र = भगवान श्रीराम
  • कृपालु = कृपा करने वाले
  • भवभय = संसार रूपी जन्म-मरण का भय
  • दारुणम् = भयंकर
  • नवकंज = नवीन कमल
  • लोचन = नेत्र
  • कंज मुख = कमल के समान मुख
  • कर कंज = कमल समान हाथ
  • पद कंजारुणम् = लाल कमल जैसे चरण

भावार्थ:

हे मन! उन कृपालु भगवान श्रीराम का भजन कर, जो संसार के भयंकर जन्म-मरण के भय को दूर करने वाले हैं। जिनकी आँखें नव खिले कमल के समान सुंदर हैं, मुख कमल के समान कोमल और मनोहर है, हाथ कमल जैसे कोमल हैं और चरण लाल कमल के समान शोभायमान हैं।

आध्यात्मिक संकेत:

मन को संसार के भय से मुक्त करने का उपाय केवल प्रभु स्मरण और भक्ति है।

कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील नीरद सुन्दरम्।
पट पीत मानहु तडित रुचि शुचि, नौमि जनक सुतावरम्॥

शब्दार्थ:

  • कंदर्प = कामदेव
  • अगणित अमित = असंख्य, असीम
  • नवनील नीरद = नवीन नीले मेघ
  • पट पीत = पीले वस्त्र
  • तडित = बिजली
  • जनक सुतावरम् = जनकनंदिनी सीता के श्रेष्ठ पति

भावार्थ:

भगवान श्रीराम की शोभा असंख्य कामदेवों से भी अधिक है। उनका शरीर नवीन वर्षा के नीले बादल के समान सुंदर है। उन्होंने पीले वस्त्र धारण किए हैं जो ऐसे लगते हैं मानो काले बादलों में बिजली चमक रही हो। मैं जनकनंदिनी सीता के पति श्रीराम को प्रणाम करता हूँ।

आध्यात्मिक संकेत:

राम केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि मर्यादा, करुणा और दिव्यता के केंद्र हैं।

भजु दीनबंधु दिनेश दानव, दैत्यवंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंदकंद कौशल, चंद दशरथ नंदनम्॥

शब्दार्थ:

  • दीनबंधु = दुखियों के मित्र
  • दिनेश = सूर्य
  • दानव दैत्यवंश निकंदनम् = राक्षस कुल का नाश करने वाले
  • रघुनंदन = रघुवंश के आनंददाता
  • आनंदकंद = आनंद का स्रोत
  • कौशल चंद = कौशल्या के चंद्रमा समान पुत्र
  • दशरथ नंदन = राजा दशरथ के पुत्र

भावार्थ:

हे मन! उन श्रीराम का भजन कर जो दुखियों के सच्चे मित्र हैं, सूर्य के समान प्रकाश देने वाले हैं और दानवों का विनाश करने वाले हैं। वे रघुवंश के गौरव, आनंद के मूल स्रोत, माता कौशल्या के चंद्रमा समान प्रिय पुत्र और राजा दशरथ के पुत्र हैं।

आध्यात्मिक संकेत:

राम भक्तों के दुख हरते हैं और भीतर ज्ञान का प्रकाश जगाते हैं।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु, उदारु अंग विभूषणम्।
आजानुभुज शरचाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणम्॥

शब्दार्थ:

  • सिर मुकुट = सिर पर मुकुट
  • कुण्डल = कानों में आभूषण
  • तिलक चारु = सुंदर तिलक
  • आजानुभुज = घुटनों तक लंबी भुजाएँ
  • शरचाप-धर = धनुष-बाण धारण करने वाले
  • खरदूषण = राक्षस खर और दूषण

भावार्थ:

भगवान श्रीराम के सिर पर मुकुट है, कानों में कुंडल हैं, मस्तक पर सुंदर तिलक है और दिव्य आभूषण उनके शरीर की शोभा बढ़ा रहे हैं। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं और वे हाथ में धनुष-बाण धारण किए हुए हैं। उन्होंने युद्ध में खर-दूषण जैसे बलवान राक्षसों को पराजित किया।

आध्यात्मिक संकेत:

राम सौम्यता और शक्ति का अद्भुत संतुलन हैं—करुणा भी और धर्मरक्षा भी।

इति वदति तुलसीदास शंकर, शेष मुनि-मन-रंजनम्।
मम हृदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनम्॥

शब्दार्थ:

  • शंकर = भगवान शिव
  • शेष = शेषनाग
  • मुनि मन रंजनम् = ऋषियों के मन को आनंद देने वाले
  • हृदय कंज = हृदय रूपी कमल
  • कामादि खल दल = काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुण

भावार्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं—हे प्रभु! आप भगवान शिव, शेषनाग और मुनियों के मन को आनंद देने वाले हैं। कृपा करके मेरे हृदय रूपी कमल में निवास करें और काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दुष्ट विकारों का नाश करें।

आध्यात्मिक संकेत:

भक्ति का उद्देश्य केवल स्तुति नहीं, बल्कि हृदय शुद्धि है।

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो, बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो॥

भावार्थ:

जिस सुंदर सांवले प्रभु श्रीराम में मन लग जाए, वही सहज रूप से प्राप्त हो जाते हैं। वे करुणा के भंडार, अत्यंत बुद्धिमान, विनम्र स्वभाव वाले और भक्तों के प्रेम को समझने वाले हैं।

संदर्भ:

यह माता पार्वती (गौरी) का सीता जी को आशीर्वाद है।

एहि भाँति गौरी असीस सुनि, सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मन्दिर चली॥

भावार्थ:

गौरी माता का ऐसा आशीर्वाद सुनकर सीता जी और उनकी सखियाँ अत्यंत प्रसन्न हुईं। तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता जी बार-बार माता भवानी की पूजा कर प्रसन्न मन से मंदिर से लौट चलीं।

॥ सोरठा ॥

जानी गौरी अनुकूल सिय हिय, हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम, अङ्ग फरकन लगे॥

भावार्थ:

जब सीता जी ने समझ लिया कि माता गौरी उन पर प्रसन्न और अनुकूल हैं, तब उनके हृदय में इतना आनंद हुआ कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। शुभ संकेत के रूप में उनके बाएँ अंग फड़कने लगे, जो मंगल और शुभ फल का संकेत था।

समग्र संदेश

यह स्तुति केवल भगवान श्रीराम के रूप-सौंदर्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह बताती है कि:

  • राम भय हरने वाले हैं — संसार के दुख और भ्रम से मुक्ति देते हैं।
  • राम करुणा के सागर हैं — दीन-दुखियों के सहायक हैं।
  • राम धर्म और शक्ति के प्रतीक हैं — अधर्म का नाश करते हैं।
  • राम हृदय शुद्धि के आधार हैं — काम, क्रोध, लोभ को मिटाते हैं।
  • सच्ची भक्ति प्रेम और समर्पण है — कर्मकाण्ड से अधिक हृदय का भाव महत्त्वपूर्ण है।

इस स्तुति का गूढ़ भाव है:

“मन को राम में स्थिर करो, भय मिटेगा, हृदय शुद्ध होगा और जीवन में करुणा व मर्यादा आएगी।”